Superhit Hindi Shayari

Paigham-e-Mohabbat

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Akelapan

अब तो तन्हाई ही हमारी सबसे अच्छी साथी है, जो हर हाल में बस हमारा साथ निभाती है।

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खुद से ही रूठ कर खुद को मनाते हैं, हम अकेलेपन की आग में रोज़ जल जाते हैं।

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शाम की उदासी और यह तन्हाई का आलम, बस यही बचा है अब मेरे जीने का मरहम।

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दर्द इतना है कि बयान तक नहीं होता, और यह अकेलापन हमसे सहन नहीं होता।

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सन्नाटे की गूँज में खुद को तलाशते हैं, हम अपने ही अकेलेपन में सुकून तराशते हैं।

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अकेलेपन से अब कोई गिला नहीं है हमें, जो अपना था वो कभी मिला नहीं है हमें।

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जब अपनों ने ही छोड़ दिया साथ हमारा, तो यह अकेलापन ही बन गया सहारा हमारा।

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तन्हाई की इन गलियों में मुकाम किसका है, यहाँ तो हर एक शख्स सिर्फ अजनबी सा है।

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रात का हर तारा जैसे हमसे सवाल पूछता है, यह अकेलापन क्यों तुम्हारा हाल पूछता है।

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महफिलें सजती रहीं और हम दूर बैठते रहे, अपने अकेलेपन के कांटे चुपचाप सहते रहे।

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कोई नहीं है हमारा इस वीरान दुनिया में, बस यह अकेलापन ही है हमारे इस आशियाने में।

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दिल की बात दिल में ही दबा कर रखते हैं, हम अपने अकेलेपन से यूँ वफा करते हैं।

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कदम लड़खड़ाते हैं जब तन्हाई का सफर होता है, हर एक अपना यहाँ सिर्फ एक बेगाना पहर होता है।

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अपने ही साए से अब डरने की नौबत आ गई, लगता है जिंदगी में तन्हाई की पूरी हुकूमत आ गई।

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रातों के अंधेरे में जब आँख खुल जाती है, तन्हाई की एक ठंडी हवा रूह को छू जाती है।

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अकेले रहना सीख लिया है हमने अब इस दुनिया में, जहाँ मतलब के रिश्ते हैं बस हर एक फरिश्ते में।

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कोई तो हो जो कहे कि मैं तुम्हारे साथ हूँ, वरना यह तन्हाई तो ले डूबेगी इस बात पर हूँ।

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शाम होते ही दिल में एक अजीब सा डर छा जाता है, लगता है फिर से यह अकेलापन लौट कर आता है।

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आईने के सामने खड़े होकर खुद से पूछते हैं, हम क्यों इस तरह अपनी खुशियाँ लूटते हैं। जवाब में सिर्फ एक खामोशी मिलती है हमें, और हमारे अकेलेपन के आंसू छलक उठते हैं।

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तन्हाई का यह बोझ अब उठाया नहीं जाता, किसी को अपना दर्द अब बताया नहीं जाता। सबकी अपनी-अपनी दुनिया है अपनी मस्ती में, हमारा अकेलापन किसी को रुलाया नहीं जाता।

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महफिल में भी हम अक्सर खोए रहते हैं, अपने दिल के जख्म खुद ही धोए रहते हैं। दुनिया समझती है कि बहुत खुश हैं हम, मगर हम तो अंदर से पूरी तरह रोए रहते हैं।

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दर्द जब हद से बढ़ जाता है तो हंसी आती है, और तब जाकर ये तन्हाई गले लग जाती है।

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सपनों के आशियाने में सन्नाटा छा गया, लगता है मेरा अकेलापन मुझे फिर से पा गया।

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घर की दीवारें भी अब सवाल पूछती हैं, कहाँ गया वो शख्स जो हर हाल पूछती थीं। हम चुपचाप बैठ जाते हैं कोने में सर झुकाकर, फिर हमारी ये तन्हाई हमें और रुलाती है।

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खुद से ही बातें करने की आदत हो गई है, लगता है इस तन्हाई से हमें मोहब्बत हो गई है।

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अकेलेपन की रातें बहुत लंबी होती हैं, तड़ियों और सन्नाटों से सजी होती हैं। दिल मचल उठता है अपनों को याद करके, मगर आँखें सिर्फ आंसुओं से भरी होती हैं।

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इस तन्हाई के शहर में हम अकेले रह गए, सारे सपने हमारे आँखों में ही बह गए। कोई पूछने वाला तक नहीं आया हाल हमारा, हम खुद के ही बनाए जाल में उलझ कर रह गए।

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तुझसे बिछड़ने के बाद यह सजा मिली है, कि हर तरफ बस तन्हाई ही सिला मिली है। अब किसी और से क्या उम्मीद रखें हम, जब अपनी ही परछाई ने हमसे बेवफाई की है।

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रात की चादर ओढ़ कर सो जाते हैं हम, अपने सारे गमों को छुपा लेते हैं हम। सुबह उठकर फिर वही झूठी हँसी हंसते हैं, अकेले में जी भरकर रो लेते हैं हम।

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अकेलेपन का यह सफर बहुत लंबा है, यहाँ हर एक शख्स मुखौटा पहने नंगा है। दिखावे की इस दुनिया में कोई किसी का नहीं, यहाँ तो बस धोखे का ही बाजार चंगा है।

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भीड़भाड़ से दूर एक कोना तलाशते हैं, हम हर पल खुद में ही खुद को तराशते हैं। कोई नहीं आता अब हाल पूछने हमारा, हम खुद ही अपनी तन्हाई से बातें करते हैं।

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खामोशियाँ चुभने लगी हैं अब इस दिल को, अकेलापन जकड़ रहा है धीरे-धीरे हर तिल को। काश कोई आ जाए थामने हाथ हमारा, वरना बुझ जाएगी ये उम्मीद का दिया बिल्कुल।

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पन्नों पर उतार देते हैं अपने दिल का दर्द, यही बचा है अब इस तन्हाई का फर्ज। कोई सुनने वाला नहीं हमारी दास्तां को, बस कलम ही समझती है हमारा हर एक मर्ज।

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कभी-कभी खुद पर ही दया आती है मुझे, ये अकेलापन किस मोड़ पर ले आया है मुझे। सबके होते हुए भी कोई अपना नहीं है यहाँ, न जाने किस बात की सजा दे रही है दुनिया मुझे।

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दिल चाहता है कि कोई ऐसा हो जो समझे, हमारी खामोशी के पीछे का दर्द भी परखे। मगर यहाँ तो हर कोई तमाशा देखने वाला है, अकेलेपन के सिवा न कोई अपना और न कोई बरखे।

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सन्नाटा चीखता है जब कमरे की दीवारों में, तेरी यादें भटकती हैं फिर से इन ख्यालों में। हम तो अकेले ही जीने के आदी हो चुके हैं, अब कोई फर्क नहीं पड़ता इन हालातों में।

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तन्हाई के समंदर में गोता लगा रहे हैं, हम अपनी ही तबाही का जश्न मना रहे हैं। जो कभी हमारे हुआ करते थे बहुत खास, आज उन्हीं के दिए जख्मों को सजा रहे हैं।

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रातभर जागना और छत को ताकते रहना, यही रह गया है इस तन्हाई का गहना। कोई नहीं पूछता अब हाल हमारा यहाँ, खुद से ही खुद की बातें कहते रहना।

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अपने साए से भी अब डरने लगे हैं हम, इस अकेलेपन से रोज़ लड़ने लगे हैं हम। तू क्या समझेगा हमारे इस दर्द की गहराई, टूट चुके हैं अंदर से और ऊपर से हँसने लगे हैं हम।

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चाय की प्याली अब ठंडी होने लगी है, तन्हाई की आदत अब गहरी होने लगी है। तू जो छोड़ गया है बीच सफर में हमको, ये ज़िंदगी अब मुकम्मल बहरी होने लगी है।

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दिन तो किसी तरह लोगों में कट जाता है, मगर रात का हर पहरा बहुत भारी हो जाता है। अकेलापन जब सीने से आ कर लिपटता है, तो हँसता हुआ इंसान भी अंदर से बिखर जाता है।

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भीड़ इतनी है इस दुनिया की इस बस्ती में, फिर भी कोई अपना नहीं इस कश्ती में। हम अकेले आए थे और अकेले ही जाना है, बस यही सच लिखा है मेरी इस हस्ती में।

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अंधेरे कमरे में खुद से मुलाकात होती है, तन्हाई के हर लम्हे से लंबी बात होती है। कोई पूछे अगर हमसे हमारे हाल-ए-दिल, तो जुबां खामोश और आँखों में बरसात होती है।

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ये तन्हाई का आलम भी बहुत अजीब होता है, न कोई पास होता है और न कोई करीब होता है। बस अपनी ही परछाई से बातें करते रहते हैं, और दिल का हर एक जख्म दिल के ही नसीब होता है।

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खुशियों के मेले में भी हम अकेले रह गए, अपनों से दिल की बात कहने से रह गए। सबको हंसाते-हंसाते जब खुद पर बारी आई, तो सारे आँसू हमारे भीतर ही बह गए।

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तन्हाई की इन दीवारों से अब डर नहीं लगता, कोई अपना यहाँ अपना सा नज़र नहीं लगता। कट रही है ज़िंदगी बस इसी खामोशी में, अब तो रोने पर भी आँखों में असर नहीं लगता।

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अकेलेपन की इस हद तक आदत हो गई है, कि अब रोशनी से भी थोड़ी शिकायत हो गई है। हम तो बैठे रहते हैं अपनी ही धुन में मगन, लगता है खुद से ही मोहब्बत हो गई है।

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रात की खामोशी में एक शोर गूँजता है, मेरा यह अकेलापन मुझ पर हँसता है। पूछता है मुझसे कि तेरा अपना कौन है, इस सवाल पर दिल बहुत ज़ोर से रोता है।

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शाम ढलते ही कमरे के कोने रोने लगते हैं, अकेलेपन के जख्म फिर से हरे होने लगते हैं। तू जो पास नहीं है तो ये लगता है जैसे, सांसें भी अब मुझसे किनारा करने लगती हैं।

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भीड़ में भी एक अजीब सा सन्नाटा रहता है, यह अकेलापन हर पल मुझे तड़पाता है। कोई नहीं है यहाँ सुनने वाला दिल की बात, बस तन्हाई का साया ही मेरे साथ रहता है।

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