Paigham-e-Mohabbat
ज़ंदगी में किसी की चाहत को अगर पाना हो, तो खुद को उसके रंग में ढल जाना हो। मोहब्बत कोई खेल नहीं है दो पल का, इसके लिए सारी उम्र फ़िदा करना पड़ता है।
इश्क़ में हर एक लम्हा नया लगता है, हर ग़ैर भी हमको अपना लगता है। जब से बस गए हो तुम इस दिल में मेरे, ये सारा जहाँ हमको सपना लगता है।
उनका जो ज़िक्र आया तो महफ़िल बदल गई, हमारी ही आँखों में ये दुनिया बदल गई। हम तो बैठे थे बस उन्हें देखने की चाह में, और देखते ही देखते मेरी तक़दीर बदल गई।
लगता नहीं है दिल मेरा उजड़े दयार में, किस की बनी है आलम-ए-नापाएदार में। काँच के टुकड़े हैं सभी इस दुनिया में, ढूंद रहा हूँ मैं किसी को प्यार में।
कौन कहता है कि मोहब्बत बर्बादी है, सच्ची मोहब्बत की तो दुनिया आवादी है। जो मिट जाते हैं किसी के इश्क़ में यारो, उन्ही की बदौलत ये दुनिया शादी है।
वो जो हम में तुम में क़रार था तुम्हें याद हो कि न याद हो, वो जो मुझ से तुम से क़रार था तुम्हें याद हो कि न याद हो। वही अपने वादे निभाने का, वही बात करने के लाने का, वो जो इक़रार था, वो जो इंकार था, तुम्हें याद हो कि न याद हो।
कभी किसी को मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता, कहीं ज़मीन तो कहीं आसमान नहीं मिलता। मोहब्बत के भी अपने ही दस्तूर हैं यारो, जिसे चाहो उसे वो मेहरबान नहीं मिलता।
दिल-ए-नादान तुझे हुआ क्या है, आख़िर इस दर्द की दवा क्या है। हम हैं مشتاق (मुश्ताक़) और वो बेज़ार, या इलाही ये माजरा क्या है।
रात दिन यूँ बिताते हैं हम, जैसे कोई पुराना क़र्ज़ चुकाते हैं हम। तेरे इश्क़ में येही हाल हुआ है मेरा, आईने के सामने खुद को भूल जाते हैं हम।
हज़ारहा ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले, बहुत निकले मेरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले। मोहब्बत में नहीं है फ़र्क़ जीने और मरने का, उसी को देख कर जीते हैं जिस का काफ़िर दम निकले।
रगों में दौड़ते फिरने के हम नहीं क़ायल, जब आँख ही से न टपका तो फिर लहू क्या है। - मिर्ज़ा ग़ालिब
उस की याद आई है साँसो ज़रा आहिस्ता चलो, धड़कनों से भी इबादत में ख़लल पड़ता है। - अज्ञात
उड़ती सी इक ख़बर है कि तुम लौट आओगे, इतनी सी बात पर ही मेरा दिल धड़क गया। - फ़िराक़ गोरखपुरी
साक़ी की हर निगाह पे बल खा के पी गया, लहरों से खेलता हुआ लहरा के पी गया। - जिगर मुरादाबादी
उम्र जलबों में बसर हो ये ज़रूरी तो नहीं, हर शब-ए-ग़म की सहर हो ये ज़रूरी तो नहीं। - कैफ़ी आज़मी
होंठों पे कभी उन के मिरा नाम ही आए, आए तो सही बर-सर-ए-इल्ज़ाम ही आए। - अदा जाफ़री
हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले, बहुत निकले मिरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले। - मिर्ज़ा ग़ालिब
हम ने सीने से लगाया दिल न अपना बन सका, मुस्कुरा कर तुम ने देखा दिल तुम्हारा हो गया। - जिगर मुरादाबादी
कोई आहट कोई आवाज़ कोई चाप नहीं, दिल की गलियाँ बड़ी सुनसान हैं आ जाईए। - मजाज़ लखनवी
लोग कहते हैं कि तू अब भी ख़फ़ा है मुझ से, तेरी आँखों ने तो कुछ और कहा है मुझ से। - क़तील शिफ़ाई
वो तो ख़ुश-बू है हवाओं में बिखर जाएगा, मसअला फूल का है फूल किधर जाएगा। - परवीन शाकिर
आप पहलू में जो बैठें तो सँभल कर बैठें, दिल-ए-बेताब को आदत है मचल जाने की। - जलील मानिकपूरी
इन आँखों की मस्ती के मस्ताने हज़ारों हैं, इन आँखों से वाबस्ता अफ़साने हज़ारों हैं। - शहरयार
चुपके चुपके रात दिन आँसू बहाना याद है, हम को अब तक आशिक़ी का वो ज़माना याद है। - हसरत मोहानी
मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरे महबूब न माँग, मैं ने समझा था कि तू है तो दरख़्शाँ है हयात। - फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
वो आए बज़्म में इतना तो 'मीर' ने देखा, फिर उस के बाद चराग़ों में रौशनी न रही। - मीर तक़ी मीर
एक मुद्दत से तेरी याद भी आई न हमें, और हम भूल गए हों तुझे ऐसा भी नहीं। - फ़िराक़ गोरखपुरी
सुना है लोग उसे आँख भर के देखते हैं, सो उस के शहर में कुछ दिन ठहर के देखते हैं। - अहमद फ़राज़
ये इश्क़ नहीं आसाँ इतना ही समझ लीजे, इक आग का दरिया है और डूब के जाना है। - जिगर मुरादाबादी
इश्क़ पर ज़ोर नहीं है ये वो आतिश 'ग़ालिब', कि लगाए न लगे और बुझाए न बने। - मिर्ज़ा ग़ालिब